Palkein...........................................

पलकें ………………………………


कुछ पलकें रातो में सोयी सोयी  सी थी, कुछ ख्वाबो में खोई खोई सी थी 
कुछ अपनों को सपनो में पिरोई सी थी,कुछ ग़मों में खुद को भिगोई सी थी 
कुछ में भरे जज़्बात'थे ,तो कुछ में कल के सपने आबाद थे 
कुछ कोस रही थी बीते कल को,तो कुछ सजा रही थी आने वाले पल को 
ये पलकें बहुत कुछ कहती है ,ये ज़िंदगी कहाँ  सदा के लिए रहती है। ………………… 




कुछ पलकों में था सुकून बहुत ,तो कुछ कर रही थी परेशानियों से बातें
कुछ  खेल रही थी ख्वाबो से ,तो कुछ के साथ उलझने थी कैसे काटें ये रातें 
कुछ पलकें थी नादान बहुत ,हकीकतों से अनजान बहुत 
कुछ पलकें यु ही जिये जा रही है ,आसमानो के तारों को माँ के आँचल में सिये जा रही है। ...................... 



कुछ पलकें थी माँ के आँगन में ,कुछ खोई थी किसी के यौवन में 
कुछ पलकें थी अपनी संतानो की चिंता में,  तो कुछ थी अपनों से हीनता में 
कुछ अपनापन थोप रही थी दुसरो पे ,कुछ खुशियाँ किराये पर दिये जा रही थी 
कुछ पलकें यु हीं जिये जा रही थी। ……………………………………। 




कुछ परख रही थी अपनों को ,कुछ तोल  रही थी सपनो को
कुछ थी दुसरो की सफलताओं से हैरान ,कुछ थी अपनी नाकामियों से परेशान
कुछ कर रही थी जाने वालो का इंतजार ,तो कुछ उनकी यादों में रोयी जा रही थी


कुछ पलकें यु हीं जिये जा रही थी। ……………………………………। 



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